राजनीति जिसे जब लगता है समझ लिया है। तब ही वो कुछ ऐसा रंग दिखा देती है। कि हम खुद ही आश्चर्य में पड़ जाते है। कि क्या हमने गलत अनुमान लगा लिया है?
जहां हर कोई आता तो खाली हाथ है। किन्तु जाता झोली भरकर है। जो चाहे जितना जनता के हित की बात कर ले। सुरक्षा का मुद्दा उठा, देश हित की बात पर वोट मांग ले। किन्तु सच्चाई तो यहीं है कि देश हित से ज्यादा पार्टियां अपना हित साधने में लगी रहती है। उसके बाद ही वो किसी और के हित के बारे में सोचती है।
हद तो तब हो जाती है । जब वो किसी ओर की उपलब्धि भी अपनी बता पार्टी का प्रचार कर लेती है। जब उस उपलब्धि में ग्रहण लग जाता है। तब वो उससे दूर होने लगती है। जो मौके की तलाश में रहती है। कोई मौका दिखा नहीं की वो राजनीति करना शुरू कर देती है।
देश हित जब अपना हित बन जाएं
देश हित के नाम पर जनता को ठगने वाली पार्टियां, अक्सर जनता को काल्पनिक दुनिया में ले जाती है। जहां उन्हें सपने तो आसमां में उड़ने का दिखाती है। किन्तु उन्हें वास्तविक रूप में जमीन भी नहीं दे पाती है। इस बीच ठगी तो केवल जनता जाती है। जो देश हित के नाम पर वोट दे अक्सर अपना अहित कर बैठती है।

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