हम उस देश में रह रहे है। जहां इंसान अपने कर्म से जाना जाता है। जहां कर्म ही पूजा बन जाता है।
लेकिन जब कर्म ही खराब हो जाएं ... तब जैसे सबकुछ व्यर्थ हो जाता है।
आज यहीं कुछ हाल देश का है... जहां नाम तो राम का... पर काम उसके विपरीत किया जा रहा है...
जहां राम नाम की लूट तो मची है... पर उसके पीछे सियासी खेल खेला जा रहा है।
आज राम की गंगा मैली पापियों का पाप बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद हर कोई खुद को गंगाजल सा पवित्र कह दूसरें को अपनी ईमानदारी बताने में लगा है।
पर वास्तव में अगर हम अपने चारों ओर देखें तो पाएंगे कि आज राम राज्य की कल्पना तो दूर... यहां शासन ही कुशासन सा हो रहा है। अत्याचार की सीमा पार, दीन हीन का कोई सहारा नहीं दिखाई दे रहा है। चुनाव सिर पर है इसके चलते हर कोई खुद को गरीबों का मसीहा कह रहा है।
बात यहां तक होती तो चल भी जाता है। पर यहां तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी अपने काम से जोड़ा जा रहा है।
राम का नाम ले, हर कोई भोली जनता को अपने काम का हिसाब दे रहा है। काम चाहे जितने किये हो, पर क्रेडिट लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है।
काले से सफेद करने की राजनीति के बीच जैसे आज हर कुछ राजनीति के बीच फंस कर रह गया है। कर्म करों फल की चिंता न करों, लगता है जैसे लोगों ने कुछ ज्यादा ही गंभीर ले लिया है। जहां कर्म कुछ भी हो, पर फल तो अपना मनचाहा ही लेना है।

Comments