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Mahanagar Movie: एक महिला के आर्थिक मजबूती के चलते बदलाव को दिखाती है 'महानगर' मूवी






जब एक भारतीय महिला अपने घर की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए, चार दीवारी से निकल पैसा कमाने निकलती है। तब वो बदल जाती है। दुनियादारी की समझ विकसित करती है। 

इसी बदलाव को लेकर सत्यजीत के निर्देशन में बनी मूवी 'महानगर' है। जो एक महिला के आर्थिक मजबूती के चलते उसमें हुये बदलाव को काफी करीब से दिखाती है। 

ये है फिल्म की कहानी का सारांश

इस फिल्म की कहानी एक बांग्ली परिवार की है। जहां घर का बेटा एक अच्छे रोजगार की तलाश में है। जो बैंक में एक अंशकालीन नौकरी करता है। जिसके चलते घर में अक्सर पैसों की तंगी बनी रहती है। इसी तंगी को दूर करने के लिए, घर की बहु माधबी मुखर्जी एक सैल्समैन की जॉब कर लेती है।

जहां से शुरु होता है उसका संघर्ष, जिसको लेकर उसके अपने सास ससुर  सहमत नहीं होते है। इसके बावजूद जब वो नौकरी करने निकलती है। तब वो आर्थिक सम्पन्नता का असली अर्थ जानती है। जिसका नूर उसके चेहरे पर साफ नजर आता है। जो धीरे- धीरे बदलने लगती है। 

इस बीच जब वो पैसों का प्रबंधन और दुनियादारी को समझ ही रही होती है। जहां वो एक सीधी साधी बहु से एक सैल्समैन के किरदार में निखर रही होती है।
इस बीच उसकी मुलाकात एक एग्लों इंडियन से होती है। जो उसे अपने होठों पर लिपस्टिक लगने की बात करती है। जो उसे आत्मविश्वास से भर सकती है। जिससे वो अलग तरह का अनुभव करती है।


जॉब को करने का दिखाई देता है संघर्ष


ऐसे में क्या हो, जब उसे अपने घर में एक मात्र साथ देने वाला पति उससे असुरक्षित होने के चलते, उसे जॉब छोड़ कर घर पर रहने की बात करें। उसका बॉस उस एग्लो इंडियन को बेमतलब ही जॉब से निकाल दें। माधवी का प्रमोशन कर दें। माधवी के पति की जॉब हाथ से निकल जाएं। ऐसे में माधवी किसका साथ निभाती है ये फिल्म में देखना बड़ा ही दिलचस्प होता है।
 

इसलिये देखनी चाहिए ये फिल्म 

भारतीय फिल्म की जब बात आती है तब उसमें सबसे पहला नाम 'सत्यजीत रे' का आता है। जिन्हें अपनी मूवी के लिए ऑस्कर का लाइफटाईम अचींवमेंट अवार्ड मिला था। जिनकी फिल्मों में प्रमुख पाथेर पांचाली,अपू संसार, देवी, अपराजिता है। जिसके बाद 'महानगर' मूवी जैसे उनके निर्देशन में चार चांद लगाती है। 
जो भारतीय रीति रिवाज ,भाषा ,संस्कार और बुद्धिमत्ता की एक अलग ही परिभाषा गढ़ जाती है। जो एक भारतीय महिला के स्वाभिमान की बेहतर छवि को बताती है। 


 

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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

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life real meaning thought

पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..