Jyotirao Phule : कैसे भूल जा सकता है ज्योतिराव फुले को




 Jyotirao Phule: जिस देश में जाति पहले नाम बाद में आता है। जहां आपकी जाति ही आपका भूत, भविष्य और वर्तमान तय कर देती है। जहां जाति के नाम पर कोई बड़ा, कोई छोटा समझ लिया जाता है। 

ऐसे समय में जैसे उस महान पुरुष का जिक्र करना जरुरी हो जाता है... जिन्होंने हर उस चीज का विरोध किया। जहां जाति के नाम पर इंसान के साथ अन्याय की सारी हदें पार कर दी जाती है। जाति ही उसकी भाग्य विधाता हो जाया कर जाती है। 


सत्यशोधक समाज की स्थापना

 ज्योतिराव फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। जिसका अर्थ सत्य की खोज करना था। जहां धार्मिक कर्मकाण्ड के काम अपनी जाति के लोगों के द्वारा ही किये जाते है। जहां कोई बड़ा छोटा नहीं सबको समानभाव से देखा जाता था।

बालिका और नारी शिक्षा पर जोर

ज्योतिराव फुले महिला सशक्तिकरण के भी प्रबल समर्थक रहे है। उनका मानना था कि किसी भी तबके के जागरण के लिए उसकी पहली शर्त शिक्षा होती है। जिसके माध्यम से उसका नवजागरण किया जा सकता है। राव ने अपनी पत्नी सावित्री बा फुले को पढ़ाया ,उन्हें प्रेरित किया कि वो बालिका को पढ़ाये। 

जाति नहीं कर्म से

आज के समय में जहां हम अंग्रेजों से तो आजाद हो गए है। पर अपनी उस सोच से नहीं।  जहां जाति के नाम पर कोई बड़ा, कोई छोटा समझ लिया जाता है। ऐसे समय में ज्योतिबा फुले के विचारों का स्मरण किया जाना जरुरी है। जो हमें बता गए है। इंसान अपने काम से जाना जाता है न कि अपने जाति से। व्यक्ति की पहचान उसके गुणों से होती है न कि उसकी जाति से होती है।

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