B.R. Ambedkar: भीमराव होना आसान नहीं है






B.R. Ambedkar: यू तो आजादी को आज काफी वक्त हो गया। जहां हर कोई आधुनिकता के रंग में रंगा हुआ है। लेकिन क्या वो अपने मन के उस मैल को खत्म कर पाया है। जहां जात पात का भेद मन में आज भी है। 
भले कबीर अपने दोहे में कह गए है। कि इंसान अपनी जाति से नहीं, अपने कर्म और ज्ञान से बड़ा है। लेकिन अंधों और गूंगों की दुनिया में आज जाति ही सबसे बड़ी है। जहां आपका सरनेम ही सबकुछ हो जाता है। 

एक छोटा बच्चा जो अभी इस दुनिया को समझ ही रहा होता है वहां उसे उसकी जाति का बोध कर बड़ा, छोटा समझा दिया जाता है। जिसके मुताबिक वो व्यवहार करने लगता है।

ऐसे में आज भीमराव का जिक्र करना जरुरी हो जाता है जिन्होंने अपने समय में वो कर दिया... जो आज भी करना मुश्किल है...

मैं बात कर रही हूं भीमराव अम्बेडकर की जिनके ज्ञान के आगे हर कोई बौना पड़ जाता है। जिन्हें विश्व के सबसे बड़े संविधान का प्रेरणा स्त्रोत कहा जाता है। जिन्होंने संविधान के ड्राफ्ट को तैयार किया। अन्य देश के संविधान का अध्ययन कर भारत के संविधान में हर चीज को लाया... जो हमारे देश की विविधता को बनायें रखें। सबको सामान्य न्याय दिलाने का जिम्मा अपने सिर उठाया। 
जो लोग उनकी आज ये कह आलोचना करते है... कि उनकी जगह हम होते ... हम भी ये कर लेते... इसमें क्या बड़ी बात है। उन्हें कौन समझाएं... कौन बतायें... कि जाति के चलते तिरस्कार का अनुभव क्या होता है? जहां शिक्षा जैसे मूल अधिकार से किसी को इसलिए दूर कर दिया जाता है। क्योंकि वो औरों की नजर में छोटी जात का है। जहां समाज के लगाये नियमों में वो बंध कर रह जाता है।
ऐसे समय में अगर कोई संघर्ष कर देश विदेश में अपना नाम बनता है। वो आम कैसे हो सकता है।



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