Taali : 'ताली' बजाऊँगी नहीं, बजावऊँगी



स्त्री,पुरुष के अलावा हमारे समाज में कोई तीसरा लिंग भी है ये केवल हम तब ही समझते है। जब हम कोई फॉर्म भरते है। उसके अलावा न तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट में, न ट्रेन में और न किसी संस्थान में हमें वो दिखाई देते है। न ही हम उन्हें देखना चाहते है। जिनका अपना कोई अस्तित्व आज भी हमारी में नजरों नहीं है।

इसी प्रश्न को लिए सुष्मिता सेन की मूवी 'ताली' बजाऊँगी नहीं, बजावऊँगी' है। जो की ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट श्रीगौरी सावंत के जीवन पर आधारित है। 

जो हम सब को एक पल के लिए हमारे देश में रह रहे उन लाखों गणेश से गौरी बने, तीसरे लिंग की कहानी को बताती है। जिन्हें जब अपने परिवार की सबसे ज्यादा जरुरत होती है। तब वो त्याग दिये जाते है।

उनके अधिकारों की लड़ाई के लिए गणेश से गौरी बनें ट्रांसजेंडर की कहानी हम सब को उनकी अहमियत बताती है। जो गरिमा के साथ इस समाज में रहने का हक रखते है।
जो अगर स्त्री, पुरुष नहीं है तो वो जिंदा ही नहीं है। इसी नियम को बदलने की कोशिश में गौरी बगावत करने की कोशिश करती है। जहां से फिल्म की कहानी एक अलग मोड़ लेती है।
जहां पर सुष्मिता सेन की एक्टिंग की जितनी तारीफ की जाएं उतनी कम है। जो हर ट्रांसजेंडर के दुख को जैसे अपनी एक्टिंग से दम भरती है।

जिसका वो डॉयलॉग दिल को छूता है कि '' जिस देश में कुत्तों तक का सेंसेज होता है। पर ट्रांसजेंडर का नहीं, ऐसे देश में आप जैसे लोगों के बीच में जीना,डरावनी चीज है। जो हमारे समाज का कड़वा सच बयां करता है।


अफसोस मानव अधिकार की बातें करने वाला ये समाज तब मुंह फेर लेता है। जब इन्हें अपने से कोई अलग दिखाई देता है। जो सोच आज भी हम में इस तरह से है कि अगर ये हमें से कुछ काम करवाने का सोच रहे हो। तो हमें लगता है कि ये पैसे ही तो मांग रहे है। 

ऐसे में इस फिल्म को देखना और भी ज्यादा जरुरी हो जाता है। जो हम सब को ट्रांसजेंडर को देखने का एक अलग नजरिया देता है। जहां आज इंसान अनेक तरह की सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक परेशानी से जूझ रहा है। ऐसे में जब आपके अस्तित्व का पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया जाएं, तब संघर्ष दुगुना हो जाता है। 




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