किसी ने बिल्कुल सही ही कहा। कि जिस चीज की सुर्खियां सबसे ज्यादा बने, जो सबसे ज्यादा दिखाई जाएं वहींं सबसे ज्यादा नजरअंदाज की जाती है।
अब लद्दाख को ही बात ले लो। आर्टिकल 370 जब खत्म हुआ था। तब उस पर बनी सुर्खियों की कमी न थी। जहां हर कोई ये बताने में लगा था कि विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने क्या फायदे है।
वहां आज जब लदाख की सीमा पर इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के द्ववारा 6 मार्च से विरोध किया जा रहा है। जिस बीच वो केवल नमक और पानी का सेवन कर रहे है। जिस भूख हड़ताल को उन्होंने 'क्लाइमेट फास्ट ' नाम दिया है।
जिसमें उनकी सरकार से मांग लद्दाख को केन्द्र की छठी सूची में डालने को लेकर है। जिससे की लद्दाख को एक तरह की संवैधानिक सुरक्षा मिल जाएं। जो लद्दाख को किसी भी तरह के शोषण और हस्तक्षेप से बचा सके।
अब उनके इस विरोध में लद्दाख की जनता उनके साथ खड़ी नजर आ रही है।
हालांकि उनके इस अनशन्न को 20 दिन से ज्यादा का वक्त हो गया है। लेकिन इसके बावजूद मुख्यधारा की मीडिया से लेकर प्रशासन चुपी साधे है। जहां कोई कुछ बोलने से दूर हो रहा है।
ऐसे में ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा। आज हर उस जगह पर मौन बढ़ रहा है जहां पर बोलना जरुरी है। अगर ये मौन ऐसा ही बढ़ता रहा। तो वो दिन दूर नहीं, तब पर्यावरण के विनाशक हम ही होगें। जहां विकास की आड़ में हर उस चीज को खत्म किया जा रहा है। जहां पर मानव हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
अपनी जैव विविधता के लिए जान जाने वाला आज भारत खुद खतरे की निशानी पर है। इसके बावजूद अगर हमें लगता है कि हमें मौन ही रहना चाहिए । तब इसके जिम्मेदार हम स्वयं ही होगें।
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