वैसे तो हम सब बहुत अरसे से लोकतंत्र की गाथा गाते आ रहे हैं ∣ जहां हम सब अपने उस एक वोट की कीमत को भली प्रकार से जानते हैं ∣ जो किसी को नेता बना भी सकता है ∣ किसी को सिंहासन से उठा भी सकता है ∣
लेकिन जैसे लगता है कि आजकल उस वोट की कीमत कुछ फीकी सी हो रही है। जहां हम सब अपने उस वोट की कीमत को कम समझ भेड़ चाल चल रहे हैं ∣
गलत होते देख उससे आंख मोड़ रहे हैं ∣ जो गांधी के चौथे बंदर के रूप में है ∣ जो बुरा ही देखता है ∣ बुरा ही सुनता है ∣ और बुरा ही बोलता है ∣ जिसके पास आज सबकुछ होने के बावजूद कुछ भी नहीं है ∣ जो इंसान कम मतलबी ज्यादा बन बैठा है ∣
ऐसे में आज लोकतंत्र की आत्मा घायल हो रही है ∣ जिसका हर जगह से सिर्फ शोषण हो रहा है ∣ जिसके संरक्षण करी आज मौन है ∣

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