Better than celebrating Women's Day: महिला दिवस मनाने से बेहतर है





किसी ने बिल्कुल सही कहा है जिस दिन को मनाया जाएं वो चीज हमेशा एक दिवस बनकर ही रह जाती है। महिला दिवस के मामले में भी कुछ ऐसा ही हाल है। जहां हम मार्च के एक दिवस को मना खुद को ये तसल्ली दिला देते है। कि सबकुछ सही तो चल रहा है। आखिर परेशानी क्या है?

'स्त्री पैदा नहीं होती वो बनायी जाती है'

पर उसके अगले ही दिन से जैसे हर महिला को ये आईना दिखाया जाता है कि तुम से नहीं होगा। तुम्हें तुम्हारी सीमाएं बताने की कोशिश की जाती है। 
ऐसे में जैसे नारीवादी चिंतक सिमोन दे बोवुआर की बात वो सही सी लगती है 'स्त्री पैदा नहीं होती वो बनायी जाती है'। वो बनायी जाती है'। जहां उसे ये सिखाया जाता है कि केवल लज्जा ही तुम्हारा गहना है।
तुम्हें ये नहीं करना वो नहीं करना । इसकी पूरी सूची तैयार की जाती है। जो इसे मान ले वो सही वरना वो बेशर्म कहलाती है। जिसे बात बात पर ये कहा जाता है कि तुम कैसी लड़की है। कुछ सिखाया ही नहीं है। अफसोस वो केवल इसमें सिमट कर रह जाती है। जिसमें शिक्षित न अशिक्षित सब बराबर से होते है। 

केवल फोन नया है सोच वहीं पुरानी है
 
ऐसे में इस विषय पर बात करना जरुरी हो जाता है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां है। जो उनको इतना पीछे करें हुए है।आज भले हम सब खुद को मॉडर्न मानते हो। लेकिन महिलाओं के विषय में सबके विचार ज्यादा कुछ बदले नहीं है। जहां उनका काम घर के सम्भालने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है।
जहां मध्यम और उच्च दोनों वर्ग एक जैसे ही विचार पर काम कर रहें है। वहां सिर्फ मोबाईल नया आया है। सोच वहीं पुरानी है।जो समय से अपने काम तो कर लेते है लेकिन अपनी उस पुरानी सोच को छोड़ने में आज भी बहुत ज्यादा संघर्ष कर रहे है। 

एक उम्मीद की किरण जैसे दिखाई देती है

इसके बावजूद एक वो चीज जो महिलाओं के हित में दिखाई देती है तो वो है 'महिलाओं को खुद के प्रति जागरुक होना, जहां वो ये समझ चुकी है। कि आर्थिक और सामाजिक रुप  से उनका सशक्त होना कितना जरुरी है'। इन सब के बावजूद हम सबको चीज पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है तो वो है कि हम खुद को समाज के किसी ताराजू में ना नापकर खुद के अस्तित्व को समझें।

खुद को बेहतर माने। जब हम समानता की बात करते है तब हम खुद भी पिछड़ा न मान आगे बढ़े। जब तक हम अपने लिए खुद कोई  निर्णय नहीं लेगें। तब तक हम दूसरों के हाथ की कठपुतली से ज्यादा और कुछ नहीं रहेगें।




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