वहां आज हर चीज के दाम आसमान छू रहे थे। जो
आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहे थे। दो पैसे को तरसे वो नंगे बदन जो आज अपनी ही पहचान से दूर हो रहे थे। जो आएं थे कमाने दो पैसे वो आज गुमनामी के बीच खाक हो रहे थे।
जहां सबकुछ मंहगा कुछ भी सस्ता न था। वहां न जानें क्यों आज इस दुनिया को छोड़ जाने वालों के दाम उनकी जिंदगी के मुकाबले कम हो रहे थे।

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