कौन कहता है सपने सिर्फ आंखों से देखें जाते है। कई बार सपने खरीदें और बेचे जाते है।
जिसे देख इंसान अक्सर काल्पनिक दुनिया में चला जाता है। जहां वो खुद को किताबों के बीच पाता है।
जिस जैसे हजारों लोग एक ही सपना अपनी आंखों में बुनते है।
ऐसे करते हुए वो ये भूल जाते है। इस लड़ाई में वो केवल अकेले नहीं है। बल्कि करोंड़ों की संख्या में लोग है। जो सरकारी बाबू बनने का सपने खरीदें बैठे है।
अफसोस उन्हेंं इस बीच ये नहीं बताया जाता है। कि एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बीच इंसान को कई कीमत अदा करना पड़ता है।
जहां एक समय के बाद उसकी किताबें बोझ बन जाती है। जब वो इस दुनिया के बीच खुद को बेरोजगार पाता है।
जहां प्राइवेट नौकरी कर रहे लोगों की सैलरी में वृद्धि होती है ∣ वो आगे निकल जाते है।
वहीं सरकारी नौकारी की तैयारी कर रहा वो परीक्षार्थी दुनिया से कट जाता है।
जहां वो उस कागज के समान हो जाता है जिस पर केवल लोगों ने हर वो चीज लिखी है। जो उसे निकम्मा साबित कर रही है। जहां उसकी काबिलियत पर धूल लग जाती है।
जिसकी कीमत उसे खुद कई बार बड़ी अदा करनी पड़ती है। जहां वो औऱों के लिए बोझ के अलावा और कुछ नहीं रह जाता है। जब इस प्रतियोगी दुनिया में रोजगार खोजने निकलता है। तब वो खुद को अकेला पाता है। जहां उसके पास कोई गुण नहीं शेष रहता है।
हर साल करोड़ों की संख्या में देश का बच्चा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बीच खुद को अनिश्चित काल के में प्रवेश करता है।
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