Skip to main content

गणतंत्र होने के होने असल मायने




'गणतंत्र' एक ऐसा तंत्र जिसमें जनता का प्रतिनिधित्व होता है। जहां जनता अपनी सरकार का स्वयं चयन करती हो। वहां जनता के लिए, जनता के द्वारा बनाया गया शासन रहता है जिसे हम गणतंत्र की संज्ञा देते है।
किन्तु जब बात भारत की आती है तब हम उसके एक अलग ही रुप को पाते है। जो वहीं भूमि है जहां पर त्रासदी से त्रस्त लोग जब निवास करने आएं तब उन्हें ये सुकून था कि वो यहां पर सुरक्षित रहेंगे।

जहां आज भी अनेकता में एकता की बातें की जाती है।  जहां दो कोस पर भाषा और बोली बदल जाती है। किन्तु अगर बात इस अनेकता को खत्म कर केवल एक ही को सम्पूर्ण ताकत देने की आ जाएं, तब इस प्रश्न करना जरुरी हो जाता है 
पूरी दुनिया को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का पाठ पढ़ाने वाला क्या आज अपने देश में ही इसका पालन कर रहा है?

तो इसका उत्तर हां है, जहां आज भी भारत एक ऐसा देश है। जहां विविधता के बावजूद सब एक ही झंडे के नीचे खड़े हुए नजर आते है। भले उनका धर्म अलग हो किन्तु सबके दिल सिर्फ भारत के लिए धड़कते है।
 
इसके बावजूद कुछ लोग है जो इस विविधता को खत्म करने की कोशिश करते नजर आते है। किन्तु वो शायद ये भूल जाते है कि ये वहीं भारत जहां 100 साल से ज्याद दूसरे देशों ने राज किया । किन्तु भारत की उस संस्कृति- सभ्यता को नहीं मिटा पाएं जिसके चलते आज भी वो विश्व में जाना जाता है।

ऐसे किसी देश में जब बात गणतंत्र की हो, तब समझना जरुरी हो जाता है । आखिर कौन सी ऐसी चीज है जो इस चलाये हुए है?

तब हमें संविधान नजर आता है। ये वहीं संविधान है जिसके ऊपर कोई भी नहीं है। न धर्म न  कोई  जाति। फिर आज क्यों हम धर्म के नाम पर बांटे जा रहे है?
जहां हमारा अनुच्छेद 14 करता सबकी समानता की बात।फिर क्यों आज हम काले, गौरे और जात पात में नापे जा रहे है ?

जहां सबको  है अपने धर्म के प्रति आस्था रखने का अधिकार। जहां राम भी रहीम भी। फिर आज हम शेष विशेष की क्यों बात करते है  ?

जो संविधान हमें देता मूलभूत अधिकार है जिसके आगे सब बौने से है। फिर क्यों आज हम उस संविधान को कम करने में लगे हुए है ?

जब उसने कोई भेदभाव नहीं किया । फिर क्यों हम उच्च नीच के भेद को मन में लेते है?

संविधान की उस प्रस्तावना को क्यों आज हम अपने मन में नहीं सजोते है जिसकी शुरुआत ही 'हम भारत के लोगों से होती है'।

जो भारत की बेहतर तस्वीर हमारे सामने प्रस्तुत करती है । जो सबको समान अग्रणी रखती है। जो लोकतंत्र की आस्था पर विश्वास करती है। जो सभी नागरिकों को सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक  और धर्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने पर जोर देती  है। जो समाजवाद के भाव को अपने हदय  में सजोती है।

फिर हम कौन होते है किसी की स्वतंत्रता को लेने वाले। क्यों हम धर्म नाम पर आज भी आपस में  लड़ते है? 

Comments

Popular posts from this blog

Today Thought

कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

life real meaning thought

पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..