क्या वाकई आज अंधा कानून है


आज भी जब हम कोर्ट के नाम का जिक्र करते है। तब हमारी आंखों के सामने सबसे पहले जिसकी तस्वीर आती है। वो हाथ में तराजू लिए एक महिला की होती है। जिसकी आंखों में पट्टी बंधी रहती है जिसका मतलब है कि न्याय के समक्ष सब समान है जिसमें  कोई विशेष नहीं है । 

इसके बावजूद क्या आज न्याय सबको समान रुप से मिलता है?

जहां गलत और सही पद और पैसा देखकर ठहराया जाता  है। न्याय की आश में कितने बुगुनाह लोगों की जान ऐसे ही निकल जाती है। जहां गरीब के साथ न्याय न्याय नहीं जबकि अमीरों के साथ जरा सी भूल होने पर उनको न्याय देने की जल्दी की जाती है।

 जहां अगर किसी लड़की के साथ कुछ गलत हो जाएं। तो उसे अपराधी का एक जु्र्म साबित करने में सालों लग जाते है। वहीं एक अपराधी को अपराध से मुक्त में होने में जरा सा भी वक्त नहीं लगता है।

जिसके चलते वो अपराधी तो मुक्त हो जाता है। जबकि जिस लड़की के साथ ये गलत काम हुआ उसकी पूरी जिंदगी खराब हो जाती है। जिसकी पूरी जिंदगी एक शहर से दूसरा शहर बदलने में निकल जाती है।
 जिसके चलते है ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होता है कि ये अंधा कानून है जहां एक अपराधी को जेल से रिहाई जल्दी और अपराध साबित करने में सालों का वक्त लग जाता है।

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