वेस्टर्न कल्चर का विरोध करने से पहले


अभी न्यू ईयर आया नहीं। कि उसे पहले ही लोगों के बीच इसको लेकर एक विवाद जैसी स्थिति खड़ी हो गयी।
इसमें एक वो लोग है जो इसे अपनी संस्कृति से अलग बता रहे हैं । दूसरे वो लोग जो इसका विरोध तो करते हैं। पर कहीं न कहीं उसका अनुसरण भी खुद ही सबसे ज्यादा करते हैं। 
फिर बात चाहे अंग्रेजी भाषा का उन‌ पर चढ़ता प्रभाव हो या फिर शिक्षा जैसे विषय पर उनकी निर्भरता हो। 

ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर क्या पाश्चात्य संस्कृति का पालन करना चाहिए कि नहीं? 

जिसको लेकर सबकी राय अलग हो सकती है ∣ किन्तु ये बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज हम अपना संस्कृति को भूल दूसरी संस्कृति में इतने रंग गए हैं कि हम अपनी संस्कृति के मूल्य को भूल चूके है ∣

हमें अपनी पहचान याद नहीं है ∣ जहां हम भारतीय कम अमेरिकी ज्यादा दिखने का प्रयास कर रहा है ∣ जो हमारे भाषा से ले कर वेषभूषा तक में नजर आ रहा है ∣
जहां हम दूसरों की कॉपी करने के चक्कर खुद को खो बैठे है ∣ ऐसे में हमें पहले  खुद का मूल्यांकन करना होगा। 
इस बीच ये बात याद रखनी होगी। कि हमारे देश का संविधान 'पंथनिरपेक्ष' की भावना पर विश्वास करता है ∣ जहां सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाया जाता है ∣ 
वहीं बात रहीं अपनी संस्कृति की पहचान की तो। पहले हम स्वयं अपनी संस्कृति का सम्मान करें। तब ही हम दूसरों से उसके सम्मान की बात कर सकते हैं । हमें खुद पर गर्व करना होगा।

ये सब तब सम्भव होगा जब हम अंग्रेज़ों का दिया चश्मा उतार खुद का मूल्यांकन करेंगे।



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