सच में आज बदल गए हैं हम

सच में आज हवा की दिशा कहीं मुड़ सी गयी है ∣ अपने अभिमान को स्थिर करने के लिए ये हर जगह ये अपनी नाक रगड़े है ∣
जिस पर किसी ने सच ही कहां है कि आज जमाना बदल चुका है ∣ जहां शर्त इस बात की लगी है कि अपना मतलब साधने के लिए कौन कितना इंसानियत से नीचे गिर सकता है ∣
भला उनसे भी कोई पूछे जो आज सदाचारी बने। खुद को ईमानदार साबित करने वालों ने बेशर्मी की कितनी चादरें ओढ़ी है । 

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