बचपन में हिन्दी की एक कहानी पढ़ी थी जिसका शीर्षक ही 'मुक्तानंदजी' जी था।
जिसमें एक ऐसे पात्र के बारे में बताया गया था जो कोई भी मुक्त की चीज लेने से पीछे नहीं हटते है।
फिर भी चाहे उसके चलते उन्हें कितनी भी परेशानी का सामना न करना पड़े।
आज के समय में इंसान भी कुछ इसी किस्म का हो गया है जो ये जानते हुए कि आज का जमाना किसी को एक पैसा भी मुफ्त का देने का नहीं है तब भी वो उसे लेता जाता है। ये जानते हुए की इसकी कीमत उसे किसी न किसी रूप में चुकानी होगी।
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