अपने लिए तो सब जीते है किन्तु दूसरे के लिए जीना कहां आसान होता है?
इसके बावजूद कुछ लोग इस दुनिया में ऐसे होते है। जो दूसरे लोगों को अपनी आंखों से इस दुनिया को देखना सीखाते है।
ऐसा ही दृश्य शांताराम के निर्देशन में बनी फिल्म ''दो आंखे बारह हाथ'' में हमें नजर आता है। जहां एक आम पुलिसवाला 6 कैदियों को सुधारने का जिम्मा अपने सिर ले लेता है। वो उनको एक नेक इंसान बनाने की कोशिश में लग जाता है ।
हिंसा करने वाले कैदियों को अहिंसा के रास्ते पर वो ले जाता है। अप्रत्यक्ष रूप से वो उनकी आंखे बन जाता है।
जो उन्हें जीने का सही तरीका सीखाता है।
आज के समय में इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है जब चारों तरफ केवल हिंसा का साया नजर आता है।जहां लोग आंखें होने के बावजूद उसे देखने से नजर अंदाज कर देते है। जहां सब जैसे धृतराष्ट्र होने की ही चेष्टा करते नजर आते है।
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