काश वो दिन




कहते है इंसान किसी भी चीज की कीमत उसके खोने के बाद ही समझता है। जब तक वो उसकी नजरों के सामने होती है तब तक वो कहां उसे समझ पाता है।  
जैसे आज ही का तो दिन था । कहने को तो उसे बीते पांच साल से ज्यादा का वक्त हो गया था किन्तु लगता है जैसे कल की तो बात है।
हम सब की जिंदगी में कुछ लोग ऐसे जरूर होते है जिनसे हम भले ज्यादा बातचीत न करें किन्तु उनके प्रति हम बहुत सम्मान रखते है। 
पर जैसे एक छोटी सी गलती हमें ताउम्र के लिए वो जख्म सा दे जाती है। 
कहते जिंदगी समय के साथ सबको सबकी अहमियत बताती है फर्क महज इतना सा होता है किसी को पहले किसी को बाद में उसकी याद दिलाती है।
वो दिन कुछ अलग सा था । मार्केट जाना कोई नयी बात नहीं किन्तु वो दिन कुछ निराला सा था। हम सब मार्केट आएं थे ।
मार्केट में कुछ लेने की ले लिए हम सब  दुकानों में नजर दौड़ा ही रहे थे कि तभी हमारी नजरें भाई -भाभी पर पड़ी।
संयोगवश हम सब पर जहां पर टकराएं उसके सामने ही समोसे की दुकान थी। जो उस वहां फेमस मानी जाती है। 
भाई भाभी संग हम सब उस दुकान के अंदर के   साथ खाने पहुंचे ।सबने अपनी फरामाइशे बताई। 
अंत में जब हमारा नंबर आया । तो हम ने खाने से साफ इंकार कर दिया कि हमारा आज मन नहीं है। 
सब ने एक दो बार आग्रह करने के बाद हमें नजर कर दिया।
पर उसके कुछ देर बाद भाईया ने आग्रह किया कुछ नहीं तो इमरती ही खा लो वो तो काफी अच्छी होती है तुम्हें पसंद भी होगी। 
पर जैसे उस दिन हमारा मन ही नहीं था। बिना ज्यादा सोचे समझे हमने मना सा कर दिया कि हमें नहीं खाना है। मीठा अब हमें ज्यादा पसंद नहीं है।

वो दिन जैसे उनके साथ हमारा आखिर दिन था।

 कुछ महीने  के बाद खबर आयी कि भाई का एक्सीडेंट हो गया उनको एम्स में भर्ती किया गया है।
उस दिन मन में थोड़ा सा खेद और भगवान से प्रार्थना थी कि वो ठीक हो जाएं। पर जैसे भगवान को कुछ और ही मंजूर था।

कुछ दिनों के बाद नवरात्रि के आखिरी दिन भाई इस दुनिया को छोड़ चले गए। जब उनसे मिली तो वो चारों तरफ से लोगों के बीच सफेद कपड़े से लिपटे हुए थे।

उस दिन जैसे हमने जिंदगी का एक अलग सा स्वाद चखा था। जहां काश के अलावा हमारे मन में कोई शब्द न था।


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