जब बिना किसी कारण के कोई विश्वास किया जाएं। जिसका कोई प्रमाण न हो , न तर्क तब वो अंधविश्वास की श्रेणी में आता है।
अफसोस की अनपढ़ों से ज्यादा तो पढ़े लिखें लोगों के द्वारा इस अंधविश्वास का पालन किया जाता है। जो अंधविश्वास के चलते न सिर्फ खुद का नुकसान करते है। बल्कि अपने आस पास के लोगों का भी नुकसान कर बैठते है। जो अपने आप को बड़ा ज्ञानी समझते है।
इन सब में उनका जो सबसे ज्यादा साथ निभाती है वो समाज की कुरीतियां होती है। जो समाज के लोगों के एक ऐसे रास्ते पर चलने को मजबूर करती है। जिसकी नींव ही झूठ की बुनियाद पर रखी जाती है।
इसी अंधविश्वास पर बात राजाराम मोहन राय करते है जो इसके विरोध में अपना स्वर मुखर करते है। लोगों को सच और गलत में फर्क सीखते है । सादियों से चली आ रही उन कुरीतियों को तोड़ने की कोशिश करते है जो समाज के लिए अभिशाप बन रही है। बात चाहें बाल विवाह की हो या सत्ती प्रथा, जातिवाद की राय ने न सिर्फ इसका कड़ा विरोध किया है। बल्कि इसके खिलाफ कड़े कदम भी उठाएं है।
वर्तमान समय में धर्म की राजनीति कर रहे लोगों के द्वारा एक बार फिर जनता के बीच अंधविश्वास का बीज बोया जा रहा है। जहां पर आम नागारिक पीस रहा है।
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