सिनेमा किसी समाज का दर्पण होता है जो समाज की अच्छाई -बुराई पर कटाक्ष करता है। जो न सिर्फ समाज के लोगों का मनोरंजन करता है बल्कि उनको शिक्षित करने का भी काम करता है।
जब हम 'द गाइड' मूवी को देखते है तो पाते है कि राजू (देवानंद) जब जेल से बाहर निकलता है। तब उसे समझ नहीं आता है कि वो कहां जाएं?
जहां उसका एक मन उसे अपनी मां और प्रेमिका रोजी (वहीदा रहमान) के पास चलने को कहता है। वहीं दूसरा मन उसको बदनामी भरे संसार में जाने से रोकता है।
ऐसे में राजू जीवन के भोग विलास से दूर किस तरह से जीवन के सत्य की खोज करता है ये देखना बड़ा ही दिलचस्प होता है ∣
जहां राजू अपने अतीत को भूला एक अजनबी गांव में निकल पड़ता है। वहां गांव के लोग राजू की बातों को सुन उसे 'ज्ञानी' समझने लगते है।
एक दिन जब वो गांव के लोगों को अपनी मां की कहानी सुनाता है ∣
जैसे वो आगे चलकर सत्य में बदल जाती है ∣ मानों की उसे आने वाली विपत्ति का आभास हो गया था।
उस गांव में भयानक अकाल पड़ जाता है।लोग दाने -दाने के मोहताज हो जाते है। इस बीच वो एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते है ।
ये सब देख राजू गांव के लोगों को शांति से इसका हाल निकालने को कहता है किन्तु जब इससे कोई बात नहीं बनती है।
तब कुछ लोगों की अफवाह को राजू सच में बदल 12 दिन का निर्जल उपवास रखता है।
जैसे - जैसे दिन आगे बढ़ते है वो कमजोर होता चल जाता है। इसके बावजूद उसके मन में एक प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा जन्म लेती है।
जो उसे लोगों के विश्वास पर अपना विश्वास रखने को मजबूर करती है।
एक तरफ राजू नाम का व्यक्ति एक सच्चे संत बनने की ओर आगे बढ़ता है। वहीं दूसरी तरफ उसका शरीर जैसे जवाब देने लगता है।
पर कहते है जब भावना सच्ची हो तो हर चीज सम्भव हो जाती है ऐसा ही हम इस फिल्म में देखते है जहां राजू की मां , उसकी प्रेमिका राजू को खोजते हुए उस गांव में आ जाती है।
वहीं इस सब की परवाह करें बगैर राजू मन में सिर्फ यहीं विचार रखता है कि अगर मेरे बलिदान से गांव का सूखा खत्म हो सकता है तो यहीं हो जाना चाहिए।
12 वे दिन एक तरफ जोर की बारिश होती है ∣ वहीं दूसरी तरफ राजू इस दुनिया को छोड़ चला जाता है ।
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