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संसद में जब बोलने की मर्यादा तोड़ी जाती है


तब हर भारतीय की आंखे शर्म से झुक जाती है

बचपन से हम पढ़ते आ रहे है। जनता के लिए, जनता के द्वारा बनाया गया शासन 'लोकतंत्र' कहलाता है। जहां जनता स्वयं अपने प्रतिनिधि का चयन करती है।
ये चयनित व्यक्ति कहीं और के नहीं बल्कि हमारे समाज का ही हिस्सा होते है। जो न केवल मत का बल्कि समाज के उस वर्ग का भी प्रतिनिधित्व कर रहे होते है जो उनसे प्रभावित होता है।

ऐसे में जब एक सांसद के द्वारा दूसरे सांसद को संसद में धर्मसूचक गालियां दी जाती है तब ये सोचना जरूरी हो जाता है कि क्या आज सच में हम बोलने की मर्यादा भूलते जा रहे है।
जिस संसद में ये बातें कही गयी उस पर भी गौर करना आज जरूरी हो जाता है ।
किसी भी देश के लिए संसद भवन वो पावन स्थान होता है। जहां जनता के द्वारा चुने गए नेता संसद में अपनी बात करते है। वहां कानून बनाये और पास किये जाते है।

अभी हाल ही में भारत ने अपनी नये संसद भवन में कदम रखा है। जो किसी भी देश के लिए बड़ा ऐतिहासिक क्षण था। इसी बीच हमने बहुत से सांसंदो को पुराने संसद भवन के लिए भावुक होते देखा। हो भी क्यों न वहां उनकी कर्मस्थली जो थी।
इसके साथ हमने उस पुरानी संसद में पक्ष - विपक्ष की नोंक झोंक को भी देखा है। जो किसी लोकतांत्रिक देश के लिए जरूरी होता है।
ये बात अलग है कि आज ये नोक झोंक बहुत ज्यादा व्यक्ति विशेष होती जा रही है।  

अभी हाल ही का मामला ले लो। जहां एक सभ्य सांसद के द्वारा दूसरे सांसद को धर्मविशेष गालियां दी गयी। जो किसी भी देश के लिए शर्मनाक क्षण था।

जिसको लेकर अब सोशल मीडिया में अलग प्रतिक्रिया दी जा रही है। कोई इस धर्म केन्द्रित कोई इसे राजनीति से प्रेरित बता रहा है।
 फिलहाल वजह कुछ भी हो किन्तु किसी सांसद के द्वारा ऐसी अभद्र भाषा का उपयोग करना उस मानसिकता को दिखाता है जहां वो अपने आप में सम्प्रभु है।

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