कितनी अजीब बात है जैसे- जैसे इंसान विकास की गति को आयाम दे रहा है वैसे- वैसे वो अपने बोलने के सलीके को भूलता जा रहा है ∣ ऐसा करते वक्त उसे न तो किसी तरह की कोई शर्म है न ही किसी प्रकार का कोई खेद है।
लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन में जब ऐसा दृश्य देखने को मिलता है ∣ तब ये कहने में बिल्कुल भी देरी नहीं लगती है कि कहने का सलीका का आज गायब हो गया है ∣
जहां खुद को सभ्य बताने वाले एक शिक्षित व्यक्ति के द्वारा किसी संसद को बीच सभा में गली दी जाती है ∣
इसके चलते आज सवाल ये नहीं है कि मिशन का सफल होना किस सरकार की देन है ∣ बल्कि सवाल आज देश की गंगा यमुना संस्कृति का है ∣ जो न केवल देश बल्कि विदेश में भी जानी जाती है ∣
हम सबको ध्यान रखना होगा कि कहीं ये पक्ष, विपक्ष वाली लड़ाई देश की छवि क़ो धूमिल न करें। जो आने वाली पीढ़ी को केवल दर्द दे।
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