महिला आरक्षण का विरोध करने से पहले



किसी भी समाज की प्रगति के लिए दोनों पहिये का समान रूप से चलना जरूरी होता है किन्तु जब इसमें असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। तब समाज में एक पक्ष मजबूत दूसरा कमजोर होता है।
आज जब बात महिला आरक्षण की आती है तब ज्यादात्तर लोग उसके विपक्ष में खड़े होकर ये कह देते हैं कि अगर वो काबिल है तो खुद को सिद्ध करें। आगे आएं अपना हक ले, उन्हें भला किसने रोका है ‌। 
ऐसे में ये समझना जरुरी हो जाता है कि ये वहीं महिला है जिसकी कभी समाज के डर से, कभी रीतिरिवाजों के चलते स्वतंत्रता छिन कर दिया जाता है।
ऐसे में जब एक महिला किसी क्षेत्र में आगे बढ़ती है । तब वो बहुत सी परेशानी का सामना कर वो अपनी राह को चुनती है । 

जब बात एक लोकतांत्रिक देश में आरक्षण की आती है तब समझना जरुरी हो जाता है ये बात एक दो लोगों की नहीं बल्कि देश की आधी आबादी की है ∣ जिनका विधानसभा से लेकर लोकसभा में प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है ∣  
 न विकसित न विकासशील दोनों ही जगह पुरुष ज्यादा महिला का प्रतिनिधि कम है । उन्हें समानता दिलाने के लिए आरक्षण आज समय की मांग है क्योंकि ये उनका हक है । 

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