बेटी होना क्या आसान है
जब घर की सारी जिम्मेदारी हो उसके सिर पर
किन्तु चेहरे पर रखना उसे एक मुस्कान है।
जिसके पैदा होते ही उसका सबसे पहला हक
छिन लिया जाता है
वो है उसके पैदा होने की खुशी ,
जिसे त्याग की मूर्ति बनाने की
कोशिश हर बार की जाती है।
अफसोस जब वो सोच ले थोड़ा अपने बारे में
तब उसे बिना देर करें
मतलबी की संज्ञा दे दी जाती है।
घर का हिस्सा नहीं मांगती है वो
वो तो केवल उसके आने पर
थोड़ी सी मुस्कान चाहती है।
क्या बेटी होना आसान है
जहां अपना बाद में सबका
पहले सोचना होता है
घर की चार दीवारी ही रहता जैसे
उसका संसार है।
जो ब्याही जाती
पिता की शान से
सम्पत्ति और मान से
घर बार से
केवल नहीं ब्याही जाती है
वो अपने सपनों की पतवार से।
जिसके लिए समाज अक्सर चुप ही रहता है
बेटी है हद में रहे
जैसे वो उसको हर बार सिखाया जाता है।

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