प्रकृति से खिलवाड़ , प्लास्टिक से प्यार



कहते है कि इंसान ने अपने मस्तिष्क के विकास के चलते सभी चीजों का निर्माण किया है ∣ किन्तु पर्यावरण के मामले में ऐसा लगता है कि मानव ने विकास कम उसका सर्वनाश ज्यादा किया है। जहां पर उसने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्लास्टिक के ढेर में लाकर उसे खड़ा कर दिया है। जहां से अगर हम समय रहते नहीं निकले तो बहुत देर हो जाएगी।
हालांकि भारत प्राचीन समय से ही प्रकृति प्रेमी रहा है। जहां के अगर हम इतिहास को देखें तो उसका पूरा जीवन प्रकृति के आश्रय में शुरू वहीं खत्म हो जाता था।किन्तु कहते हैं न आवश्यकता आविष्कार की जननी है जैसे- जैसे लोगों की आवश्यकता बढ़ी। 
 जो मिट्टी के कप में चाय पीते थे उन्होंने उसकी जगह 
  कांच को रख लिया। 
 अफ़सोस बेहतर के लालच ने सबकुछ प्रदूषित कर दिया। 
जो अब नदी, तालाब के अलावा हमारी थाली तक पहुंच रहा है ∣ 
अगर समय रहते हमने इस पर काम न किया तो आने वाला भविष्य हम सब का बुरा हो सकता है।

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