जब बात गुरू शिष्य के सम्बन्ध की आती है तब हम गुरू को एक मूर्तिकार के रूप में पाते है। जो शिष्य को आकार देने का काम करता है। जो संसार की अज्ञानता से उसे गुरू के ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
भारतीय की गुरूकुल शिक्षा
अगर हम भारतीय शिक्षा पद्धति को देखें. तो भारत में प्राचीन समय से ही गुरू शिष्य की परंपरा चली आ रही है। जहां गुरूकुल शिक्षा पद्धति के अपने मायने थे। जहां गुरू के आश्रय में रहकर शिष्य शिक्षा को ग्रहण करते थे।
ये बात गौर करने वाली है कि भले ही आज नारी शिक्षा को लेकर बड़ी बातें की जा रही हो किन्तु प्राचीन समय से ही भारत में नारी शिक्षा का अपना समृद्ध इतिहास था। जहां उन्हें वेदों से लेकर शास्त्र चलने तक की शिक्षा दी जाती थी।
बौद्ध शिक्षा जिसका अपना इतिहास है
वहीं बौद्ध शिक्षा के उस समय अपने मायने थे। जहां पर सभी जाति के लोगों को शिक्षा दी जाती थी। बौद्ध धर्म में आठ से बारह वर्ष की आयु में औपाचारिक शिक्षा शुरू होती थी जिसे हम 'प्रब्रज्या , या पब्बाज्जा' के नाम से जानते है।
बौद्ध शिक्षा में मूल रूप से विनय , सुत्त,और अभिधम्म जैसे तीन विषयों को पढ़ाया जाता था।इसके अलावा चिकित्सा, वेदा का भी अध्ययन किया जाता था। इस शिक्षा लेने वाले को 'भिक्षु' की संज्ञा दी गयी थी।
ज्ञान का अपना स्तर था
जबकि उस समय वैदिक शिक्षा के तहत गुरू शिष्य को मौखिक रूप से वेदों का ज्ञान देते थे । इसके बाद शिष्य उस पर चिंतन करते थे। उस समय की शिक्षा के केन्द्र में चिंतन था। इसके अलावा उस समय ज्ञान के दो स्तर होते थे जिसमें एक 'अपराविद्या' जिसका ताप्पर्य आध्यत्मिक ज्ञान जबकि 'पराविद्या' में लैकिक ज्ञान था।
आज के समय जब शिक्षा बाजारवाद का रूप बन गयी है जहां मंहगी शिक्षा का चलन बन चुका है। अफसोस की बात तो ये है कि इसमें शिक्षक छात्र के रिश्तों के अब केवल किताबों तक सीमित रह गए है।
ऐसे समय में हमें भारतीय पुरातन शिक्षा बहुत कुछ सिखाती है जहां गुरू शिष्य एक दूसरे से भावनात्मतक रूप से जुड़े हुए होते थे। गुरू की पूरी कोशिश अपने शिष्य को बेहतर इंसान बनाने की होती थी। जहां लौकिक ज्ञान के अलावा मुक्ति के मार्ग को भी बताया गया था।
5 सितंबर को इसलिए मनाया जाता है 'टीचर डे'
ऐसे में 5 सितंबर को मनाये जाने वाले 'शिक्षक दिवस' के अपने मायने है। बता दें कि हर साल भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृण्णन के जन्मदिन के अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इस दिन उन शिक्षकों का सम्मान किया जाता है जिन्होंने अपनी प्रतिबद्धता और समर्पण के बल पर न सिर्फ शिक्षा के स्तर को सुधारा है बल्कि छात्रों के जीवन में भी रोशनी की किरण लेकर आये है। सर्वपल्ली राधाकृण्णन के मुताबिक शिक्षक दुनिया में वो इंसान होते है जो किसी भी देश की नींव को बनाने का काम करते है इसलिए उन्हें दुनिया का श्रेष्ठ ज्ञान अर्जित करना चाहिए। ताकि वो देश के भविष्य को सही राह दिखा सके।
यहीं कारण है कि कृण्णन ने अपने जन्मदिन को शिक्षक के नाम समर्पित किया । जो किसी देश का मस्तिष्क होते है। जो हीरों को तराशने का गुण जानते है।
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