भौतिकवाद जब सिरा चढ़कर बोलने लगे



कहते है कि 'आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है' किन्तु जब आवश्यकता को बनाया जाएं तो उसे 'भौतिकवाद' की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
आज के समय में ये भौतिकवाद इस तरह से हमारे मन में बैठ गए है जो अब हमारे टीवी से शुरू मोबाईल की स्क्रीन पर खत्म हो रहा है।
इसमें विज्ञापन (Advertisement) काफी हद अपनी बखूबी निभा रहा है। अगर हम इस शब्द की और गौर करें, तो  Advertisement लैटिन भाषा के 'Advertere' से बना है जिसका अर्थ ध्यान खींचना है। 



इसे हम ऐसे भी समझ सकते है कि क्यों आज भी हम सब की पहली पसंद घड़ी, कोलगेट, फेयर लावली और कोका कोला, मैगी ,जैसे ही कुछ उत्पाद है। जबकि बाजार में इसके जैसे अनगिनत उत्पाद उपलब्ध है । इसका कारण कोई और नहीं विज्ञापन है। जो बाकी के मुकाबले अच्छी तरह से प्रस्तुत किया गया है जिससे अब हमारा एक रिश्ता सा बन गया है।
 जो आज हमारी सोच पर हावी हो रहा है जो हमें आज बता रहा है कि अगर हमने स्मार्ट वॉच नहीं पहनी, तो हम में स्मार्टनेस नहीं है। अगर हम ब्रांडेड की चीजों को नहीं खरीदते है तो हमारा कोई स्टेटस ही नहीं है।
 अगर हम इसका सकारात्मक पहलू देखें तो ये एक तरह से हमारे जीवन स्तर को सुधार रहा है। 
किन्तु वहीं कहते है हर सिक्के के दो पहलू होते है इसका दूसरा पहलू ये है कि इसके चलते आज इंसान लालची बनता जा रहा है। 
जहां सेल के नाम पर वो बेवजह की ही खरीदरी करना तो आज शौक बन चुका है। बिना ये सोचे समझें कि इसकी जरूरत उसे है कि नहीं। आज दिखावे की खरीदरी हम सब को बाजारवाद की बीमारी से ग्रसित कर रही है।

Comments