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फोन की दुनिया में आज का बचपन



जीवन का सबसे खूबसूरत पल बचपन होता है। जहां न किसी चीज की फिक्र,न ही ऊंच नीच का भेद मन में होता है। केवल थोड़ी सी चीज में खुश हो जाने वाला वो बचपन ही तो होता है। पर अफसोस आज के समय में तकनीक की दुनिया में बचपन कहीं गुम सा हो गया है। जो फोन की स्क्रीन से शुरू उस पर ही खत्म हो जा रहा है।आज जब अपने आस पास बच्चों को देखें तब मालूम चलता है कि तकनीक का असर बच्चों के बचपन में किस तरह से हो रहा है।
कोरोना काल ने जहां एक तरफ काम करने के तरीके को बदल दिया है। वहीं दूसरी तरफ बच्चों की निर्भरता फोन को लेकर आज पहले से ज्यादा बढ़ा दी है। जो उनके लिए खतरनाक माहौल पैदा कर रहा है।


फोन उपयोग के चलते बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव

इसके चलते न सिर्फ उन बच्चों की खेलने में रूचि कम हो रही है। बल्कि वो लगातार गेंम खेलने के चलते छोटी - छोटी चीजों को लेकर आक्रमक होते नजर आ रहे है। जो उनके व्यवहार में साफ नजर आ रहा है।
इसके चलते आज मनोचिकित्सकों के पास ऐसे माता- पिता की भीड़ सी लग गयी है। जो अपने बच्चों के फोन की आदत को छुटाना चाहते है।

मनोचिकित्सक की राय 

 माता पिता  को अपने बच्चों की फोन पर हो रही गतिविधियों पर ध्यान देने की जरूरत है जैसे कि वो फोन पर कितना समय व्यतीत कर रहे है। सोशल मीडिया पर वो किन लोगों से बातचीत कर रहे है। वो किस तरह के लोगो के सम्पर्क में है। उनके द्वारा सोशल मीडिया पर क्या चीजें साझा की जा रही है।

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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

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