समाज को एक नयी दिशा देती है अहिल्याबाई होल्कर




एक तरफ जहां देश आजादी का जश्न मनाना रहा है वहीं दूसरी तरफ अभी भी घर आयी नयी नवेली दुल्हन को उसकी सीमाएं बताने की कोशिश की जा रही है कि वो चाहे कितनी समझदार हो उसे यहां रहना तो ससुराल के मुताबिक ही है। ये सोच आज शहरी लोग की है जो अपने आप को शिक्षित कहते हैं। फिर गांव के लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
ऐसे में आज अहिल्याबाई होल्कर का जिक्र करना जरुरी हो जाता है जो हर भारतीय नारी के लिए एक प्रेरणा है। जिनकी बदौलत आज नारी शिक्षा जैसी मूलभूत चीज को ले पा रही है। 
हालांकि जब हम भारतीय इतिहास को गौर से देखते है तो पाते है प्राचीन समय में भारतीय नारियां न सिर्फ शिक्षा को ग्रहण करती थी बल्कि रण में जाकर युद्ध भी लड़ती थी। पर जैसे जैसे सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत पर अंग्रजों ने आक्रमण किया उनकी स्वतंत्रता जैसी छिन सी गयी। इसके परिणामस्वरूम आने वाले समय में उन्हें परदा ,सती प्रथा जैसी कुरीतियों का सामना करना पड़ा। 
इसके बावजूद प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति को कैसे भूला जा सकता है जिसमें रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनसे प्रेरणा पाकर न जानें कितनी नारियों ने स्वतंत्रता के संग्राम में अपना बलिदान दिया। जो आज भी अतीत के गर्भ में है।
उन्हीं में से एक महाराष्ट्र की धरती पर जन्मी रानी अहिल्याबाई होल्कर थी। जिन्होंने आगे चलकर मध्यप्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी इंदौर की बागडोर अपने हाथ ली। 
अहिल्याबाई ने उस समय नारी शिक्षा को लेकर आवाज उठायी ।  जब देश में नारी को शिक्षा का अधिकार नहीं था । जो हर एक नारी के लिए के प्रेरणा का स्त्रोत बनी । जिन्होनें न सिर्फ खुद शिक्षा को ग्रहण किया बल्कि अपने साथ देश की अनगिनत नारियों को शस्त्र चलने की शिक्षा दी। ऐसा नहीं है उनकी शिक्षा पाने की ये लड़ाई आसान रहीं किन्तु इसमें उनका साथ उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने दिया।  राजापठ से लेकर शासन को उचित ढ़ग से चलाने का पाठ उन्हें पढ़ाया। समाज को ये संदेश दिया। कि राज गद्दी पर बैठने वाला केवल वो शासक होता है। उसमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता है।
पर अफसोस शहरी न गाम्रीण ज्यादात्तर लोगों की आज भी ये धारणा बनी है कि भले वो अपनी लड़की को काॅलेज तक की पढ़ाई कराएं किन्तु बहु तो वो कम पढ़ी लिखी ही लाएगें जिससे कि वो उनके सिर पर राज न करें। ये धारणा आज हमारे समाज में कहीं न कहीं खोखला करते नजर आ रही है। काम काजी महिलाओं का उनके ससुराल में रहना मुश्किल कर रही है।
आज जरुरत है समाज को लैंगिक समानता की ओर बढ़ाने की। जहां बेटा और बहु में कोई अंतर नहीं है। 


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