व्यंग्य एक कलामकार के लिए वो हथियार है जिसके जरिए वो हमला भी कर देता है और ज्यादा चोट भी नहीं लगती है।
जो बात भी सीधे कहना मुश्किल हो जाता है। उसे व्यंग्य के जरिए आसानी से कह दिया जाता है। सत्ता में बैठी सरकार से प्रश्न पूछ लिया जाता है।
आज के समय में जब मानहानि फिल्म के टीजर से ज्यादा लोकप्रिय है ऐसे समय में व्यक्ति को अपनी बात कहने के लिए बहुत ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ती है वरना उसे जेल की हवा खाने में देरी नहीं लगती है।
वहीं जब कोई व्यक्ति अपनी बात अपनी रचनाओं के जरिए कहता है किसी घटना पर तंज कसता है । तब वो समाज के व्यक्ति को हंसने का काम तो करता है इसके साथ ही समाज को वास्तविकता का आइना भी दिखाता है तब वो 'व्यंग्य' की श्रेणी में आता है।
किन्तु आज के समय में व्यंग्य करना भी आसान काम नहीं रह गया है जहां सच बोलने पर सजा, झूठ बोलने पर तारीफें मिलती है।
ऐसे में जब हम हरिशंकर परसाई का व्यंग्य 'भोलाराम का जीव' पढ़ते है तो पाते है कि आज भी भष्ट्राचार की भेंट कितनी जिंदगी चढ़ जाती है। जहां उनकी चपले घिस जाती है अर्जी लगते हुए पर काम नहीं हो पाते है। 'वजन' रखने का रिवाज हंसती खेलती जिंदगी खराब कर देता है। ऐसे समय में अपने अधिकारों का पता होना और भी ज्यादा जरुरी हो जाता है।
आज वर्तमान समय में जब सच बोलना आसान नहीं रह गया है ऐसे समय में व्यंग्य के मायने और ज्यादा बढ़ गए है। जो सच की कसौटी पर खड़ा हुआ है।
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