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हम सबकी धर्म को लेकर अपनी अपनी आस्था है जिसके साथ हम जीवन को जीते है अपने कुछ नियमों का पालन करते है।
आज के समय में जब धर्म के नाम पर दुनिया को जीतने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में कुछ उन परतों को खोलना जरुरी हो जाता है जो हमें धर्म की असली परिभाषा बताती है।
आज गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोंंर की पुण्यतिथि पर जानते है उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'गौरा' के बारें में जो हमें आध्यत्मिकता का असली अर्थ बताता है।
'गौरा' उपन्यास को जब हम पढ़ते है तब समाज के एक दूसरे रुप को जानते है। जहां लोग चाहे कितना भी पढ़ लिख ले पर वो दिमाग से कम ही शिक्षित होते है । केवल धर्म और जाति के नाम पर खुद को श्रेष्ठ समझने की भूल करते है।
सादियों से बनाये गये रीति रिवाजों को ढ़ोते चले आते है। पर अफसोस जब उन्हें मालूम चलता है कि जिन नियम विचार का वो पालना करते आ रहे है। वो ही झूठ की बुनियाद पर रखे गए है। तब वो इंसान टूट जाते है। ऐसे समय में वो एक ऐसे धर्म का सहारा लेते है ∣ जो केवल मानवता के धर्म को समझते है ∣ जहां जाति , कुल के नाम पर कोई श्रेष्ठ नहीं है ∣ सब एक सम्मान है ∣ जो शाश्वत सत्य है ∣
हालांकि इसी बीच हम सबको ये ध्यान रखना चाहिए कि हिन्दू एक ऐसा धर्म है जो समय के साथ बदला है ∣ कुरीतियों का विरोध समय समय पर किया है ∣
दुनिया के सबसे बड़े सनातन धर्म के रूप में हमारे सामने आया है ∣

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