मर्यादा की जब होती है हानि


जब जब होती है मर्यादा की  हानि
तब तब मांओं के सिर शर्म से झुके होते है, 
तब भी वे लोग सिर उठाकर विजेता की तरह चलते हैं।
कभी दुर्गा, कभी काली का रूप समझी जाने वाली वो स्त्री उस समय सबसे ज्यादा असहाय हो जाती है जब उसकी मर्यादा को भंग करने की कोशिश की जाती है। 
स्त्री जिसे मर्यादा में रहने की शिक्षा बचपन से दी जाती है  
उससे ही अमर्यादित व्यवहार वो कायर करते हैं ∣
बरसों से युद्ध की अग्नि में जलती आ रही है वो स्त्री ही सबसे ज्यादा प्रताड़ित होती है। जब एक जंग सीमा पर दूसरी जगह उसके शरीर पर लड़ी जाती है। 
ऐसे में न जाने खुद को समाज का ठेकेदार कहने वाले कहां चले जाते हैं ∣
अफसोस पर कलयुग की दौपद्री को कहां कोई कृष्णा बचा पाते है जहां चारों तरफ सिर्फ दुर्योधन की सोच रखने वाले लोग होते है।
अपने को सभ्य कहने वाले वो लोग ही सबसे ज्यादा उस वक्त असभ्य हो जाते है जब वो किसी मासूम की इज्जत पर हाथ डालते है। 
समझ नहीं आता है ऐसे लोग कैसे खुली हवा मेें सांस ले पाते है जो खुद पूरे दूषित होते है।
ऐसे में जैसे मंटो की बात ठीक सी लगती है कि 'मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा , जो है ही नंगी, मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि ये मेरा काम नहीं,दर्जियों का काम है।'


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