वो कल से इस आशा में बैठे है कि बापू रोटी लेकर आएगा। पर उनकी मां अपने बच्चों से कैसे अपनी बेबसी कहें कि अभी मजदूरी ही नहीं मिली कि वो कुछ खाने को ले लाएं।
आज भी हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग है जो दो वक्त की रोटी के लिए तरसते है। उनके लिए वो दिन किसी त्यौहार से बड़ा नहीं होता है जब वो दोनों वक्त खाना खाते है।
तो दूसरी तरफ हमारे बीच वो लोग होते है जो हर दिन थाली में खान छोड़ने की रस्म निभाते है। थाली में वो हर दिन न जानें कितना खाना ऐसे ही बर्बादा कर जाते है।
आज हम सब को मानवता के उस गुण को समझने की जरूरत है जो हमें दूसरों मदद करने की बात करता है। जो हमें बेवजह के खाने की बर्बादी करने से बचाता है।
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