वो लड़की हुई है ∣ घर में लक्ष्मी आयी है कहने भले ,घर में पैदा हुई लड़की से उसका पहला हक छीन लेते हैं वो है ' उसके पैदा होने की खुशी'। जैसे- जैसे वो बड़ी होती है उसके हाथ में जिम्मेदारी ज्यादा उसका महत्व कम सा आंकने लगते हैं ∣
इसी बीच उसके लिए इस मुश्किल राह में बहुत कम ही लोग होते हैं जो उसे अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहते है।
इन सब बातों को दरकिनार कर जब वो लड़की अपने पैरों पर खड़ी होती है ∣ समाज के लिए नयी परिभाषा गढ़ती है तब वो समाज को एक अलग दिशा देती है ∣
इसके बावजूद इस पुरुष प्रधान समाज का ये कहना बड़ा आसान होता है कि क्या करेगी पढ़ लिख के, कलेक्टर थोड़ी न बनाना है । ऐसे में हम सब को ये बात बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि मेट्रो और रेट्रो में जमीन आसमान का फर्क है। भले ही आज कुछ लोग खुद को मेट्रो की तरह पेश करने लगे हो किन्तु उनकी सोच केवल 'रेट्रो ' तक ही सीमित है । जहां स्त्री मतलब घर की चारदीवारी है ।

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