रसों में समाया जीवन


रस की उत्पति मनुष्य के भाव और अनुभव से होकर गुजरती है। हम सब के जीवन में रस का विशेष महत्व होता है। रस के बिना किसी भी चीज का स्वाद अधूरा सा होता है। जो उस खाने की तरह होता है जिसे सिर्फ खाया जा सकता है। किन्तु उसका स्वाद बेहतर नहीं होता है। इसे खाकर ये नहीं कहा जा सकता है कि ये बहुत स्वादिष्ट है ।
जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच मनुष्य अलग -अलग तरह के रस का पान करता है। जो उसके जीवन को पूर्ण करता है। जीवन का मतलब ही सुख और दुख है। फर्क महज इससे होता है कि जब मनुष्य अपने में सुखी होता है तब वो उसके रस का पान करने लगता है। उसके मन में कभी श्रृंगार रस तो कभी हास्य रस का संचार होता है। 
जबकि इससे बहुत अलग जब मनुष्य के जीवन में दुख का पहाड़ आ जाता है तब उसके मन में करूणा रस का संचार होता है। परिस्थितियों के मुताबिक, बदल जाता है इंसान का मन कभी वो अपने जीवन से खुश, तो कभी निराश होता है।
जीवन का यहीं क्रम होता है। हर कदम - कदम पर आगे चलते जाना ही जीवन का नाम होता है। 

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