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आज के समय में मोहन राकेश के नाटक आधे अधूरे के मायने




मोहन राकेश अपने समय के एक महान नाटककार है ∣ जो कि पारिवारिक और शहरी समस्याओं पर नाटक लिखते हैं ∣
उनके नाटकों में लहरों के राजहंस,आषाढ़ का एक दिन, आधे अधूरे हैं ∣
जब हम आधे अधूरे नाटक का सारांश देखते हैं ∣ तो पाते हैं कि वो एक मध्यमवर्गीय परिवार पर आधारित है ∣ जहां पर पत्नी काम करती है ∣ पति घर पर नौकरी की तलाश करता है ∣ इसके चलते पत्नी पति की इज्जत नहीं करती है ∣ 
घर के बच्चों पर भी इसका असर होता है ∣ बड़ी बेटी घर से भाग जाती है ∣ बेटा माँ बाप का सम्मान नही करता है ∣ छोटी बेटी बहुत ज्यादा चिड़चिड़ी हो जाती है ∣ इसी के इर्द गिर्द मोहन राकेश का नाटक आ़धे अधूरे हैं ∣ जो हमें समाज एक दूसरा आईना दिखाता है ∣

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Today Thought

कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

life real meaning thought

पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..