अक्सर जो चीज हमारी आंखों के सामने होती है ∣ उसकी कीमत हमें कम ही मालूम चलती है ∣ हमें उसमें किसी तरह कोई आनंद नही आता है ∣ किन्तु जैसे ही वो हम से दूर जाती है ∣ उसकी कमी हमें महसूस होने लगती है ∣ वो भले कोई इंसान हो या कोई उपयोगी वस्तु समय आने पर सबकी अहमियत पता लगती है ∣ फर्क महज इतना होता है कि उस वक्त वो हमारे पास नहीं होता है ∣
कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है। आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो।
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