अक्सर हम कुछ फैसले दिल से लेने के चक्कर में गलती कर बैठते हैं ∣ जब उसका परिणाम आता है तब वहां हमारी सोच के बिल्कुल उलट आता है ∣ इसलिए जरूरी होता है भावना को अलग रखके तर्कसंगत होकर किसी निर्णय को लेना, जब हम ऐसा करते हैं तब हमारी भावना के अनुसार परिणाम आते हैं ∣
कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है। आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो।
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