जीवन का गणित

बचपन में जब हमारे नंबर क्लास के टाॅपर से एक भी ज्यादा आ जाया करते थे. तो हम ऐसे खुश होते थे जैसे कि हमने दुनिया की कोई बहुत बड़ी चीज पा ली हो ∣
 पर जैसे जैसे हम बड़े हुए, ज्यादा पाकर भी हमें संतोष नहीं मिला, हम ज्यादा पाने की लालसा में ऐसे बन गए, जहां थोड़े में जीवन व्यापन करने जैसी भावना मन में शेष मात्र भी नहीं बची ∣
आज जीवन की सम विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए हम बहुत आगे निकल गए हैं ∣ जिसका न कोई आदि है न अंत ∣ हरि अनंत हरि कथा अनंता ∣ 









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