आज के समय में संवाद करना जैसे हम भूलते सा जा रहे हैं ∣ एक समय था जब हम अनजान इंसान से भी ऐसे बात करते थे जैसे वो हमारा पहचान का है ∣ जहां हम कभी उसकी मदद करने में अनजान होकर करने भी हिचकिचाते नहीं थे , उसे त्यौहार की मुबारक़ देने में बिल्कुल भी शर्माते नही थे∣
एक आज का दौर है जहां सोशल मीडिया पर हमारे हजार दोस्त है पर वास्तविकता में उसकी संख्या बहुत कम है ∣
इस बात को करते हुए मुझें हिन्दी साहित्य के लेखक निर्मल वर्मा का वो निबंध 'आदि और अंत 'याद आ रहा है जिसमें वो कहते हैं 'कि आज जहां वैश्वीकरण के दौर में पूरी दुनिया सिमटकर रह गयी है जहां थोडै ही समय में हम एक से दूसरे देश के लोगों से बातचीत कर सकते हैं उस देश को जान सकते हैं ∣ वहीं दूसरी तरफ आज हमें अपने पड़ोसी के बारे में बहुत कम मालूम है हम जैसे उसके हाल चाल लेना भूल सा गए है ∣
आज वर्तमान समय में जरूरत है कि हम लोगो से प्रत्यक्ष रूप में भी बातचीत करें जिससे न सिर्फ हमारा संचार करने का तरीका ठीक होगा बल्कि हम अपने आस पास के लोगों के बारे में भी जानेंगे ∣
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