अहिंसा की सही परिभाषा बताती है दो आंखें बारह हाथ मूवी

 




'दो आंखें बारह हाथ' मूवी अहिंसा की सही परिभाषा को बताती है 

"जिसके अनुसार अहिंसा का मतलब बलवान होकर भी हिंसा को न करना है।"

ये मूवी एक ऐसे पुलिस वाले के प्रयोग पर आधारित है जिसके जैसे त्याग करने के लिए बहुत साहस की जरूरत होती है । 

इस मूवी का मुख्य पात्र  जेलर वार्डन आदिनाथ (वी शांताराम)  है जो कैदियों को अहिंसा के मार्ग पर चलाने के लिए जेल से उनकी 

रिहाई कराता है और उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह जीवन जीने की इच्छा से उनको जेल के बाहर की दुनिया में ले जाता है  उनको जिंदगी जीने का सही तरीका बताता है। जिसके लिए उसे मुख्य पुलिस अधिकारी के द्वारा रखी गयी शर्त को मानी होती है  कि अगर वो इस प्रयोग में असफल हुआ तो उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाएगी और उसे शासन के द्वारा  सजा दी जाएगी ।

पुलिस वाला सभी शर्तों को मान लेता है और उन कैदियों को जेल से बाहर की दुनिया में ले जाता है। जहां पहले तो ये कैदी उस पुलिस वाले की ज्यादा बाते नहीं मानते हैं  वे लोग अपनी मनमर्जी के अनुसार काम करते हैं किन्तु जैसे जैसे वो उस पुलिस वाले को उनके लिए जी तोड़ मेहनत करते देखते हैं जहां वो उन कैदियों के लिए वो आंखे बन जाते है जो उन्हें जिंदगी में मेहनत करके अपना पेट भरने की शिक्षा देते है जिसके 12 हाथ वो  6 कैदी होते हैं। वो उनकी सभी बातें मानने लगते हैं ।


ऐसा नहीं इस बीच वो कई गलती नहीं करते हैं किन्तु उस पुलिस वाले के विश्वास और मेहनत के नतीजे स्वरूप वो कैदी लोग अहिंसा के मार्ग को अपने जीवन में हमेशा के लिए अपना लेते हैं और कैदियों के नाम से जाने जाने वाले वो लोग इंसान बन जाते हैं। 

इसी बीच एक घटना घटित हो जाती है जिसके कारण जेलर वार्डन आदिनाथ उन कैदियों को  अपने जीवन में  कभी भी   हिंसा का सहारा न ले  वादा उन  से ले लेता हैं जिसके कारण 

ये छहों कैदी कुछ उग्र तत्वों के द्वारा बहुत  मार खाते  हैं किन्तु  उन पर कोई वार नहीं करते हैं इस बीच उनकी रक्षा एक खिलौने  वाली चंपा करती है जो जेलर वार्डन आदिनाथ  का बहुत सम्मान करती है । जो उनमें से एक कैदी के अनाथ बच्चों की सेवा करती है उनकी मां की तरह  पालन पोषण करती है और उन्हें जिंदगी जीने का सही तरीका बताती है



किन्तु  इसी बीच कुछ उग्र वादी तत्वों के आक्रमण से जेलर वार्डन आदिनाथ की  मौत हो जाती है और वो कैदी आम इंसान बन जाते हैं सरकार उनकी सजा माफ करती है और  उस  जेलर वार्डन, आदिनाथ ( वी शांताराम) का प्रयोग सफल हो जाता है ।

इस मूवी की कहानी बहुत ज्यादा आदर्श वाद पर आधारित है। जो दर्शकों को नैतिकता के पथ पर चलाने को मजबूर करती है जिसकी पटकथा बहुत  अच्छी लिखीं गई  है।

इस मूवी का सबसे अच्छा गान 

ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हों हमारे करम नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम ये अँधेरा घना छा रहा तेरा इंसान घबरा रहा हो रहा बेखबर, कुछ न आता नज़र सुख का सूरज छुपा जा रहा है तेरी रौशनी में जो दम तू अमावास को कर दे पूनम नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम …

 जब जुल्मों का हो सामना तब तू ही हमें थामना वो बुराई करे हम भलाई भरें नहीं बदले की हो कामना बढ़ उठे प्यार का हर कदम और मिटे बैर का ये भरम नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हंसते हुए निकले दम …

सबसे अच्छा है जो हमें जीवन जीने सही राह दिखाता है

निर्देशक वी शांताराम 
निर्माता
 वी शांताराम कलाकारवी. शांताराम और संध्याप्रसिद्ध चरित्रआदिनाथ और चंपासंगीतवसंत देसाई
गीतकार भरत व्यास    
गायक  लता मंगेशकर   और  मन्ना डे 
 प्रसिद्ध गीत मालिक तेरे बन्दे हम,
   प्रदर्शन तिथि 1957 अवधि143 मिनट
भाषा हिन्दी
 पुरस्कारसर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म, सिल्वर बियर का पुरस्कार, सैमुअल गोल्डविन पुरस्कार, राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण पदक जीता, बेस्‍ट फ़िल्‍म ऑफ़ द ईयर


Comments