कई सवाल 3 दिसम्बर 1984 का गैस कांड

 


" सुना है मैने की मैने कईयो
                         की जान
                           ली थी।
                   लेकिन मैं तो पहले ही
                       लापरवाही से
                          मर चुकी थी।"

मध्यप्रदेश भारत के बीच में स्थित एक ऐसा राज्य जहां पर अन्य राज्य की तुलना में पानी और जमीन सस्ती है ∣ क्या यही कारण था?  कि यूनियन कार्बाइड   कारखाना खोलने के लिए  वारेन एन्डर्सन  ने भोपाल को चुना जिसमें उसकी मदद स्थानीय सरकार ने बढ़ चढ़कर की ∣

3 दिसंबर 1984 का ये वही साल है ∣ जब भारत की  प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की गयी थी और ये देश एक दुख से नहीं उभरा था कि भारत में दूसरा बड़ा हादसा हुआ जिसे हम सब भोपाल गैस कांड के नाम से जानते हैं ∣


जिसने भोपाल की शक्ल सूरत बिगाड़ दी जिस कारण वो न केवल देश बल्कि विदेश में भी जाना जाने लगे  ∣


(स्थानीय समाचार पत्रों के पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार कारखाने में सुरक्षा के लिए रखे गये सारे मैनुअल अंग्रेज़ी में थे जबकि कारखाने में कार्य करने वाले ज़्यादातर कर्मचारी को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान नहीं था। साथ ही, पाइप की सफाई करने वाले हवा के वेन्ट ने भी काम करना बन्द कर दिया था। समस्या यह थी कि टैंक संख्या  310  में नियमित रूप से ज़्यादा एमआईसी गैस भरी थी तथा गैस का तापमान भी निर्धारित  4.5  डिग्री की जगह २० डिग्री था। मिक को कूलिंग स्तर पर रखने के लिए बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी पॉवर का बिल कम करने के लिए बंद कर दिया गया था।

जिस कारण  मिथाइलआइसोसाइनाइट (MIC)  गैस का रिसाव हुआ था ।

ऐसा नहीं था कि 3 दिसम्बर 1984 गैस कांड से ही हमें ये मालूम चला था  ∣  कि  ये गैस मानव जाति के लिए खतरनाक है बल्कि इसे पहले भी क ई ऐसी जानकारी सामने आयी जिसमें ये स्पष्ट हो गया था कि ये फैक्ट्री कितनी जानलेवा है  ∣ 

जिसकी जानकारी लोगों तक  पहुंचाने में  पत्रकार राजकुमार केसवानी   ने काफी भूमिका निभाई  पर अफसोस वोट की भूखी सरकार ने जनता से ज्यादा अपने मुनाफे को तरजीह दी  ∣

क्या इसे रोका जा सकता था ?

शायद हां, अगर इस फैक्ट्री पर उठ रहे सवाल  पर सरकार और उस फैक्ट्री की जांच  काम करती, राजकुमार केसवानी    की   खबर पर ध्यान दिया जाता है ∣  अमेरिका से आयी एक पत्रकार के प्रश्न पर वारेन एन्डर्सन  गंभीर विचार करता तो इस फैक्ट्री में काम रोका जा सकता है और इस हादसे पर लगाम लगाई जाती || 

आज इस घटना को हुए पूरे 36  साल हो गए है किंतु उन लोगों के जख्म आज भी हरे है जिन्होंने इस गैस कांड में अपने को खोया वो  झुग्गीबस्ती  जिस फैक्ट्री गैस कांड में लील सी गयी

 अगर   आज उस फैक्ट्री में  जाएं तो फैक्ट्री के  चारों तरफ ऐसे दृश्य नजर आते हैं जैसे लोग रक्त में सने  हुए  मारे चारो ओर घुम रहे हैं वो फैक्ट्री की शांति हमारे कान में चुब रही है, वो फैक्ट्री का दरवाजा हमें अंदर प्रवेश करने से मना कर रहा है जैसे वो कह रहा है, कि इसके दरवाजे हमेशा के लिए बंद ही रहे तो अच्छा है ∣



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