" सुना है मैने की मैने कईयोकी जानली थी।लेकिन मैं तो पहले हीलापरवाही सेमर चुकी थी।"
3 दिसंबर 1984 का ये वही साल है ∣ जब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की गयी थी और ये देश एक दुख से नहीं उभरा था कि भारत में दूसरा बड़ा हादसा हुआ जिसे हम सब भोपाल गैस कांड के नाम से जानते हैं ∣
ऐसा नहीं था कि 3 दिसम्बर 1984 गैस कांड से ही हमें ये मालूम चला था ∣ कि ये गैस मानव जाति के लिए खतरनाक है बल्कि इसे पहले भी क ई ऐसी जानकारी सामने आयी जिसमें ये स्पष्ट हो गया था कि ये फैक्ट्री कितनी जानलेवा है ∣
जिसकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने में पत्रकार राजकुमार केसवानी ने काफी भूमिका निभाई पर अफसोस वोट की भूखी सरकार ने जनता से ज्यादा अपने मुनाफे को तरजीह दी ∣
क्या इसे रोका जा सकता था ?
शायद हां, अगर इस फैक्ट्री पर उठ रहे सवाल पर सरकार और उस फैक्ट्री की जांच काम करती, राजकुमार केसवानी की खबर पर ध्यान दिया जाता है ∣ अमेरिका से आयी एक पत्रकार के प्रश्न पर वारेन एन्डर्सन गंभीर विचार करता तो इस फैक्ट्री में काम रोका जा सकता है और इस हादसे पर लगाम लगाई जाती ||
आज इस घटना को हुए पूरे 36 साल हो गए है किंतु उन लोगों के जख्म आज भी हरे है जिन्होंने इस गैस कांड में अपने को खोया वो झुग्गीबस्ती जिस फैक्ट्री गैस कांड में लील सी गयी∣
अगर हम आज उस फैक्ट्री में जाएं तो फैक्ट्री के चारों तरफ ऐसे दृश्य नजर आते हैं जैसे लोग रक्त में सने हुए हमारे चारो ओर घुम रहे हैं वो फैक्ट्री की शांति हमारे कान में चुब रही है, वो फैक्ट्री का दरवाजा हमें अंदर प्रवेश करने से मना कर रहा है जैसे वो कह रहा है, कि इसके दरवाजे हमेशा के लिए बंद ही रहे तो अच्छा है ∣
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