धुंधली पड़ती तस्वीरें

 



जिस चीज़ को देखूँ रोज- रोज

अब तो जैसे आंखों से ओझल हो गया वो, 

जहाँ बीता  एक समय था

 क्यों छूटा उससे अब सम्बन्ध था

जहाँ बीते अच्छे -बुरे दिन

जैसे अब उसका लेखा जोखा

ही गायब कहीं था, 

अब हो गयी 

उसकी तस्वीर अस्पष्ट 

न है  चैन और न 

 शांत सी लहर मन में, 

सिर्फ आकर्षण था जिसके प्रति

अब उसके प्रति विश्ववास उठने सा लगा है 

 हो रही अदृश्य जैसे सारी स्मृतियाँ

अब तो जैसे सब कुछ बेस्वाद लगने लगा है ∣

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