जब मूलभूत अधिकार को भी छिन लिया जाए ओर केवल नाममात्र की स्वतंत्रता दी जाएं तो वो जिंदगी सिर्फ एक पिंजरे के समान हो जाती है ∣
जो सिर्फ और सिर्फ क ई तरह की कुरीतियों और रूढ़िवादी सोच से जकड़ी हुई होती है ∣ जिसकी गिरफ्त में रहना जैसे किसी काल कोठरी में रहना है ∣
जहाँ पर नैसर्गिक अधिकार तक नहीं मिल पाते नागरिक अधिकारों की तो बात दूसरी है ∣
आज 21 शताब्दी के दौर में हाल ही हुई घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है मानों उसने महिलाओं को पिंजरे का तोता बनाकर रख दिया है ∣
जहाँ पर वो केवल जीवित एक वस्तु है इसके अलावा और कुछ भी नहीं उन्हें शिक्षा तक के अधिकार तक से वंचित करने में किसी तरह का को ई परहेज नहीं किया जा रहा है अन्य की तो बात दूसरी है ∣
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