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जीवन की सम्भावना को खोजना ही जीवन है कहता नाटक 'नदी प्यासी थी'

 


नदी प्यासी थी (नाटक) : धर्मवीर भारती

'नदी प्यासी थी' नाटक धर्म वीर भारती का अंधा युग  के बाद प्रमुख नाटक में आता  है  ∣जिसमें पृष्ठ भूमि 1949 की बरसात की है ∣ 

इस नाटक में पात्र राजेश  शर्मा, शंकर दत्त, डॉ.कृष्णस्वरूप  कक्कड़  , शीला शंकर की पत्नी और पद्मा शीला की छोटी बहन होती है ∣


राजेश जो की एक लेखक होता हैं, उसके जीवन को मुख्य केन्द्र में रखकर धर्म वीर भारती ने इस नाटक को गढ़ा है ∣ 

जिसमें राजेश अपने जीवन से बहुत निराश हो गया होता है ∣ और जिस कारण वो अपने जीवन की लीला को समाप्त कर लेना चाहता है किन्तु वो उसका साहस नहीं जुटा पाता और इसी  बीच में अपने मित्र शंकर के घर जाता है∣

 जहाँ उसकी मुलाकात शंकर की साली पद्मा से होती है जिसकी शादी डाॅ.  कृष्णस्वरूप कक्कड़ से होने वाली होती है ∣ किन्तु जब राजेश आ जाता है ∣ तब पद्मा उनके ज्ञान पर इतना मोहित ह़ो जाती है ∣ कि वो राजेश से विवाह करने की ठान लेती है ∣ और  डाॅ.कृष्णस्वरूप से विवाह न करने फैसला लेती है ∣ किन्तु राजेश नाटक के अंतिम चरण में पद्मा क़ो इस चीज से अवगत करते हैं ∣ कि तुम केवल और केवल कृष्णस्वरूप से प्रेम करती है ∣ मेरे प्रति तुम्हार केवल आकर्षण है ∣ और फिर जब राजेश बाढ़ के पानी में मरने जाता है ∣ तब उसे जीवन के न ए रहस्य के बारे में मालूम चलता है ∣ और वो फिर अपने जीवन को खत्म करने की इच्छा को सदा के लिए अपने मन से हटा देता है ∣ और शंकर उसे अपने घर ले आता है ∣

इस नाटक में जीवन के उस गूढ़ अर्थ को बताया गया है जिससे हम अभी भी अनजान है" कि हमारे जीवन में भले भी कितनी नीरसता और उदासी  क्यों न हो   हमें कभी भी उससे अपना नाता नहीं तोड़ना चाहिए   और अपने जीवन की नयी सम्भावनाओं को खोजना चाहिए" क्योंकि अगर हमें अपने जीवन भी बाहर से बहुत कटुता नजर आ रही है ∣ तो अंदर से उसमें बहुत मीठा रस भी मौजूद हैं ∣

इस नाटक की भाषा बहुत आसान है जो हर किसी को आसानी से समझ में आती है ∣ इसमें कुछ ग्रामीण स्तर के शब्द का भी उपयोग किया गया है जिसमें परसाल, जैसे शब्द है ∣

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