क ई बार हम किसी भी चीज़ की चमक देखकर उसके प्रति इतने आकर्षित हो जाते हैं ∣ जैसे की हम में अच्छे बुरा में फर्क करने की समझ ही नहीं है ∣
जिंदगी में भी क ई बार हम किसी एक क्षेत्र को देखकर इतना आकर्षित हो जाते हैं ∣ कि हम ये सोचना ही भूल जाते हैं, कि इस चमकती दुनिया के पीछे भी एक ऐसा काला सच है ∣ जो अभी हमें दिखाई नहीं दे रहा है ∣किन्तु एक समय के बाद इसकी चमक जब फीकी दिखेगी तब हमें मालूम चल ही जाएगा कि ये चमक 'दो दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात के समान' है ∣
इसलिए तो अक्सर किसी इंसान को समझने के लिए केवल उसके प्रति बाहरी आकर्षण के अलावा भीतरी सफेदी को भी जान लेना चाहिए कहीं उसमें मैल तो नहीं जो कभी छूटने वाला नहीं ∣

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