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नहीं रहें मिल्खा सिंह



भारत ने अपने एक सपूत मिल्खा सिंह को खो दिया ।जिसने भारत का नाम रोशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और भारत को  कॉमनवेल्थ में स्वर्ण पदक दिलाया ।  

आज वो हम से इतने दूर चले गए , जहाँ से किसी शख्स का आना लगभग नामुमकिन है।

अगर हम इनके अतीत के पन्नों को देखें तो जानेगें, 

मिल्खा सिंह का जन्म 2० नंम्बर सन् 1932 में पाकिस्तान के गोविन्दपुर नामक गाँव के एक सिख परिवार में हुआ था  ।वे एक ऐसे सिख धावक थे ।जिन्होंने 196० ग्रीष्म ओलम्पिक टोक्यो और सन् 1964 ग्रीष्म ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था ∣

भारत विभाजन के दौरान उन्हें अपने माता पिता को खो दिया और पाकिस्तान से भारत आ ग ए ।

अगर हम उनके सफल करियर की ओर देखें तो जानेगें, 

उन्होंने कार्डिफ, वेल्स, सयुंक्त साम्राज्य में1958 कॉमनवेल्थ    में खेल में स्वर्ण पदक जीत और अपने नाम का नया क्रीतिनाम स्थापित किया ।

 जो लोग उनसे परिचित नहीं थे उन्हें 2013 में मिल्खा पर बनी फिल्म' भाग मिल्खा भाग' से उन्हें जान लिया जो कि लेखक ओमप्रकाश मेहरा  ने बनाई थी जिसे बहुत ज्यादा लोगों ने पसंद किया ।

जिसका एक डायलॉग सबको अपनी जिंदगी में बेहतर करने की प्रेरणा देता है-

"मिल्खा सिंह ये आपके जिंदगी की आखिरी रेस हो सकती है, 

जिस पर मिल्खा सिंह कहते हैं दौडूगा भी वैसे ही" ।

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