क्या कहे तेरे दस्तुर को






जब लगे कि जिंदगी में सब कुछ सही हो गया है ∣ तो आती है एक ऐसी आंधी कि मालूम चलता है जिंदगी में सबकुछ बिखरा हुआ है ∣

हम रोज सोकर उठते इसमें नया क्या है? पर क ई बार हम अपने जीवन की दिनचर्या को पूरा करने ऐसे असमर्थ हो जाते हैं ∣ 
तब हमें मालूम चलता है ∣ दैनिक दिनचर्या
की करने की अहमियत, जिसे हम अक्सर नजर अंदाज कर देते हैं जरूरी नहीं हर सुबह हर दिन जैसी हो  क ई बार उसे पूरा करने में  ही हम असमर्थ हो जाते है जब केवल लेटे रहने के अलावा
कुछ नहीं हम सोच पातें है तब मालूम चलती है जिंदगी की एक ओर वास्तविकता की हम केवल बाहर ही नहीं खुद से भी अंदर  लड़ते हैं ∣ जब शरीर का दर्द आगाह करता है हमने क्यों उसका ध्यान नहीं दिया  ?

परीक्षा में ज्यादा नंबर आ जाए तो बड़ा गर्व करते है हम, पर जब मेडिकल रिपोर्ट में आ  जाए शरीर में किसी चीज की कमी  तो क्यों नजर अंदाज करते हैं हम खुद को पाने के चक्कर इस शरीर को भूल जाते है हम जिंदगी में आती है अनेक परीक्षा क्या हर परीक्षा को पास कर जाते है हम ?

कुछ परीक्षा  में तो हम जाते ही नहीं है और कुछ परीक्षा के  लिए हमारी मंजूरी की उसे जरूरत ही नहीं  जिंदगी में हर पहलू को समझते हुए क ई सुख -दुख सहते हुए एक नया आकार लेते हैं  हम, जिंदगी के दस्तुर को निभाते हुए अक्सर हम
खुद को ही भूल जाते है हम ,


 क्या कहे जिंदगी के सिद्धांत को जो होते नहीं न्यूटन
के गति के जैसे नियम  जिसे पढ़कर समझकर पास हो जाए हम ,इसे त़ो खुद ही लिखना और समझना पड़ता है अक्सर खुद के नियम को खुद ही तोड़ना पड़ता हैं  ∣

तब भी जब उन लोगों की देखते है  तो सुकून होता है खुद के जीने के नियम से वरन् कुछ तो केवल शिकायत ही करते जाते हैं  जैसे  कि परेशानी केवल उनकी जिंदगी में है जैसे बाकी सब तो केवल हर दिन मौज करते हैं जैसे हमारी खामोशी का मतलब जीवन में सुखों की भरमार होना है दुख का तो कोई अस्तित्व ही जीवन में न होना है ∣
हर कसौटी को पार कर जाना क्या आसान होता है? कभी तो बेमतलब ही इम्तिहान होता है जिसका पेपर और मूल्यांकन हमें ही करना होता है जहाँ भले रेस न हो पहला आने की किन्तु उसमें जिंदा रहना क्या आसान होता है ?

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