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इंसान और समय





 इंसान थक जाता है अक्सर काम करने से किंतु जिंदगी का इम्तिहान नही है थकता, सूरज भले ढलने लगता किन्तु ढलते हुए भी अपनी रोशनी कम न करता है,

 जीवन के साथ समय बदलता है अक्सर समय हाथ से ऐसे निकल जाता है किन्तु कुछ मालूम नहीं चलता है कुछ अपनों का साथ बीच में छुट जाता है

 किन्तु समय उसी तेज गति से चलता है

 सुबह होती भले कितनी अच्छी हो पर अक्सर शाम ढलने पर छोड़ जाती है जिंदगी के अनेक प्रश्न ,इन प्रश्न के बीच इंसान रह जाता है

 अक्सर समय जिंदगी में एक पल आकर ऐसे लगता है कि वो रूका सा गया है किन्तु तब भी समय चलता है दिन ढलता रात आती है समय का पहिया चलता है.

 एक समय होता है जब दिन ओर रात का फासला मालूम न चलता

 एक समय जब आता है

 जब दिन रात का हर समय न कटता

 न चलता न रूकता है

 ज्यादा बोलने वाले लोग भी जब बोलना है छोड़ देते

 तब दिन दिन

 न होकर रात

 आती है

 कुछ पल

 जिंदगी में ऐसे आते हैं

 जब रात न कटती

 न दिन ढलता है

 जब समय का पहिया चलता है.

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