नहीं रहे चिपको आंदोलन के प्रणेता



आज देश ने चिपको आंदोलन के प्रतीक माने जाने वाले सुंदर लाल बहुगुणा को खो दिया । जिसने पर्यावरण के संरक्षण के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया ।

बात चाहे छोटी जाति के लोगों को मंदिर में प्रवेश दिलाने की हो या शराबबंदी की उन्होंने अपनी आवाज  को उस बुलंदता से उठाया की वो कब आदोंलन में तब्दील हो गया किसी को खबर ही न रही ।

सुन्दरलाल बहुगुणा के अनुसार पेड़ों को काटने की अपेक्षा उन्हें लगाना अति महत्वपूर्ण है। बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने  1980 में इनको पुरस्कृत भी किया। इसके अलावा उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

और उन्होंने वृक्षों की बचाना क्यों जरूरी है उसके लिए यहाँ वाक्य गढ़ा जो जन जन का घोष बन गया 

"क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"

जिसके प्रभाव के चलते भारत सरकार ने चिंतनीय 

विषय में पर्यावरण का संरक्षण डाला  ।

पर्यावरण को स्थाई सम्पति माननेवाला यह महापुरुष आज 'पर्यावरण गाँधी' बन गया है ।

Comments